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धर्म और आस्था

क्षमायाचना पर्व पर धर्ममय माहौल, परस्पर क्षमा से समाज में आई नई ऊर्जा

परम् पूज्य मुनि श्री के प्रवचनों से गुंजा धमतरी, चातुर्मास का हुआ गरिमामय समापन

धमतरी/नगर में चातुर्मास अवसर पर विराजमान परम् पूज्य उपाध्याय प्रवर युवामनीषी प्रेमी मनीष सागर जी महाराज साहेब के सुशिष्य परम् पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब व परम् पूज्य योगवर्धन जी महाराज साहेब की पावन प्रेरणा से आज पावन क्षमायाचना पर्व का आयोजन बड़े ही श्रद्धा व भक्ति भाव से किया गया। यह आयोजन श्री पार्श्वनाथ जिनालय, इतवारी बाजार में संपन्न हुआ।

इस अवसर पर परम् पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब ने अपने प्रवचन में कहा कि जीवन में सबसे बड़ा धर्म क्षमा है। उन्होंने समझाया कि इस दिन हर व्यक्ति को अपने भीतर के अहंकार, क्रोध व ईर्ष्या के गांठों को खोलकर सच्चे मन से क्षमायाचना करनी चाहिए और दूसरों को भी क्षमा करना चाहिए। यही क्षमायाचना पर्व का वास्तविक संदेश है। यह पर्व हमें आत्ममंथन का अवसर देता है, जिससे जीवन में शुद्धि आती है और समाज में प्रेम, एकता व भाईचारे की भावना मजबूत होती है।

आज का दिन पर्वाधिराज पर्युषण पर्व का अंतिम दिन भी रहा। इस अवसर पर भद्रबाहु स्वामी द्वारा रचित मूलसूत्र “बारसा सूत्र” का वाचन एवं श्रवण कराया गया। यह वाचन परम् पूज्य प्रशम सागर जी महाराज साहेब और परम् पूज्य योगवर्धन जी महाराज साहेब के सान्निध्य में संपन्न हुआ। श्रोताओं ने प्राकृत भाषा में प्रस्तुत मूल पाठ को गहरी तल्लीनता से सुना और उसका हिंदी अनुवाद भी श्रवण किया।

प्रवचन के बाद पूरे श्रीसंघ के साथ चैत्यपरिपाटी का आयोजन किया गया। इसमें नगर के विभिन्न जिनालयों में जाकर श्रीसंघ ने सामूहिक रूप से परमात्मा के दर्शन, वंदन एवं पूजन किया। सबसे पहले श्रीसंघ पाश्रवनाथ जिनालय, इतवारी बाजार पहुँचा और वहां वंदन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। तत्पश्चात जुलूस के रूप में श्रीसंघ अन्य जिनालयों की ओर बढ़ा और बालक चौक स्थित अधिश्वर जिनालय तत्पश्चात शांति कॉलोनी स्थित अभिनंदन स्वामी जिनालय श्रीसंघ पहुंचा जहां धर्ममय वातावरण छाया रहा।

इस दौरान धर्मप्रेमियों ने धर्मलाभ भी लिया। बोहराने का लाभ श्री नवरतनमल जी मनोज जी कटारिया परिवार ने लिया। पाना झेलाने का लाभ श्री रमेशचंद जी इंद्रेश जी सराफ परिवार को प्राप्त हुआ।

क्षमायाचना पर्व पर धर्मसभा में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति ने एक-दूसरे से सच्चे हृदय से क्षमा मांगी और क्षमा दी।

आज का दिन न केवल पर्वाधिराज पर्युषण पर्व का समापन था, बल्कि पूरे चातुर्मास के दौरान साधु-संतों द्वारा किए गए प्रवचनों, तप और साधना का भी सार था। अंत में परम् पूज्य मुनियों ने आशीर्वचन देते हुए कहा कि क्षमा ही आत्मा का आभूषण है, जो मनुष्य को भीतर से शांति और सच्चा सुख प्रदान करता है।

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