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अगहन उपवास: धर्म, संयम और समृद्धि का शुभ संगम

आज अगहन मास के पावन अवसर पर श्रद्धालुओं ने पूरे उत्साह और भक्ति भाव से अगहन उपवास रखा। यह व्रत हिन्दू धर्म में अत्यंत पुण्यदायक माना गया है, क्योंकि इसे सतयुग के प्रारंभ से जुड़ा माना जाता है — जब भगवान विष्णु ने स्वयं इस मास के महत्व की स्थापना की थी।

क्या है अगहन उपवास का महत्व:
अगहन (मार्गशीर्ष) मास को धर्म, दान और तप का महीना कहा गया है। मान्यता है कि इस दिन उपवास रखने से व्यक्ति के मन, वाणी और कर्म में शुद्धता आती है। यह व्रत न केवल शरीर को अनुशासित करता है, बल्कि आत्मा को भी पवित्र बनाता है।
धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख है —

अगहने मासि यः स्नायात् दानं कुर्यात् जपेत्तथा।
सर्वपापविनिर्मुक्तः विष्णुलोकं स गच्छति॥
अर्थात अगहन मास में स्नान, दान और जप करने वाला व्यक्ति सभी पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक को प्राप्त करता है।

उपवास की परंपरा और पूजा विधि:
इस दिन श्रद्धालु ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर, पीले वस्त्र धारण करते हैं और भगवान विष्णु, लक्ष्मी माता तथा तुलसी जी की पूजा करते हैं।
तुलसी के पौधे के समीप दीप जलाने और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र के जाप से दिन की शुरुआत की जाती है।
अनेक स्थानों पर महिलाएं अगहन व्रत कथा सुनती हैं और परिवार की सुख-समृद्धि, आरोग्यता व दीर्घायु की कामना करती हैं।

अगहन उपवास का सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश:
यह पर्व केवल धार्मिक नहीं बल्कि जीवनशैली का प्रतीक भी है। यह हमें संयम, सादगी और आत्मनियंत्रण का पाठ सिखाता है। आधुनिक जीवन की आपाधापी में यह व्रत हमें आत्मचिंतन और सकारात्मक ऊर्जा का अवसर प्रदान करता है।
कहा जाता है — “अगहन में जागे मन, तो पूरे वर्ष भाग्य जागे।

भक्तों ने परिवार के मंगल की प्रार्थना करते हुए उपवास का पालन किया।

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