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5 किलोमीटर पैदल तय कर स्कूल पहुंचती हैं बेटियां, खतरे और मुश्किलों के बीच भी नहीं टूटता हौसला

धमतरी/आज जब सरकारें ‘शिक्षा सबके लिए’ का नारा देती हैं, तब भी कई बच्चे ऐसे हैं जिनकी स्कूल तक की राह अब भी कांटों से भरी है। धमतरी जिला के ग्राम सटीयारा की दो मासूम छात्राएँ— रेणुका मंडावी और उमेश्वरी सेवता—हर दिन अपने सपनों को सच करने के लिए 5 किलोमीटर पैदल चलकर कोड़ेगांव शासकीय माध्यमिक शाला तक जाती हैं। यह दूरी भले ही कम लगे, लेकिन इनके लिए यह रास्ता संघर्ष, खतरे और जिद की मिसाल है।

रेणुका मंडावी, पिता हेमलाल मंडावी, और उमेश्वरी सेवता, पिता मानसिंह सेवता, दोनों कक्षा 7वीं की छात्राएँ हैं। सुबह 8:30 बजे  ये दोनों बच्चियाँ अपने पुराने बैग और किताबों के साथ पगडंडियों पर कदम रखती हैं। करीब डेढ़ घंटे तक घाटियों और ऊबड़-खाबड़ सड़कों को पार करते हुए ये 10 बजे तक स्कूल पहुँचती हैं।

इनका रास्ता बेहद खतरनाक है। सड़क टूटी हुई है, कई जगह घाटियाँ हैं, और जंगल से होकर गुजरने के कारण जंगली जानवरों का डर हमेशा बना रहता है। हाल ही में क्षेत्र में हाथी के आने से ग्रामीणों की चिंता और बढ़ गई है। फिर भी इन बच्चियों का हौसला और लगन कम नहीं हुई। पढ़ाई पूरी कर जब शाम 4 बजे स्कूल की छुट्टी होती है, तब वे अंधेरा छाने से पहले किसी तरह घर लौटती हैं।

इन परिस्थितियों ने क्षेत्र की सामाजिक कार्यकर्ता और नेत्री अम्बिका सिन्हा का ध्यान भी आकर्षित किया है। उन्होंने मीडिया के माध्यम से सरकार से गुहार लगाई है कि इन छात्राओं समेत गांव के अन्य बच्चों के लिए सुरक्षित और सुविधाजनक परिवहन की व्यवस्था की जाए। साथ ही उन्होंने सुझाव दिया कि ग्राम पंचायत और शिक्षा विभाग मिलकर साइकिल  एवं आगामी वर्षों के लिए छात्रावास जैसी व्यवस्था पर विचार करें, ताकि बच्चों को रोजाना ऐसे खतरनाक रास्तों से न गुजरना पड़े।

इन दो बेटियों की कहानी सिर्फ कठिनाई की नहीं, बल्कि अदम्य इच्छाशक्ति की मिसाल है। यह बताती है कि जब मन में सीखने की लगन और भविष्य संवारने का जज़्बा हो, तो कोई भी दूरी बड़ी नहीं होती। सरकार और समाज यदि ऐसे बच्चों की मदद के लिए आगे आएं, तो न केवल इनकी जिंदगी आसान होगी, बल्कि शिक्षा के असली अर्थ—“सबके लिए बराबर अवसर”—को भी साकार किया जा सकेगा।

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